इन्सान
मैं, तुम और कर्म अमिट हैं
पाप-पूण्य
सत-असत् अमिट हैं
जड़-चेतन
अनश्वर दोनों
पाँच तत्व का पार नहीं है
सात सुरों का राग वही है
नव चेतन को जाग्रत करना
मानव का तो धर्म यही है
मोह पाश में जकड़ा लेकिन
क्षण-क्षण में परिवर्तन लाता
अंतरिक्ष की सीमा थामे
दुनिया को स्पंदन देता
निज गुण के बल पर उसने
मुट्ठी में थामा संसार ।
रुचि शुक्ला
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