ख़ुशी के आँसू
कभी ये मन का बोझ घटाते
कभी ख़ुशी का मोल बढ़ाते
मोती बन आँखों से गिरते
चहरे का ये नूर बढ़ाते
ख़ुशी में टपके जब ये आँसू
बोली में अवरोध हैं लाते
दुःख में बन, धारा ये बहते
सुख में रतन अनमोल सुहाते
जब भी ये नैनों में आते
अंदर तक पावन कर जाते
खुशियों को मासूम बनाते
पर आँखों को हैं तरसाते ।
रुचि शुक्ला
No comments:
Post a Comment