उत्तर विहीन प्रश्न
नए पुराने रिश्तों में
बस आज तलक सच्चाई है
ऊष्मा इतनी ही रहने की
थोड़ी ही गुन्जाइश है
आज जो मेरे अपने हैं
कल बेगाने हो सकते हैं
फिर भी आज को जीती हूँ
हर फर्ज मैं पूरा करती हूँ
कठपुतली बस बनकर उसकी
हम जीवनभर चलते हैं
किन्तु, लेकिन, के चक्कर में
जीवन ये पूरा जीते हैं
मेरी छाया, एक पहेली
हरदम प्रश्न पूछती है
क्या है ये जीवन की माया
क्यों सब इसमें पिस्ते हैं?
वो तो अब तक मिला नहीं
जिसने ये जहाँ बनाया है
होकर खुद जीवन निर्माता
उत्तर विहीन ही रहती हूँ ।
रुचि शुक्ला
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