*माँ को समर्पित*
जीवन गति में , मैं
हजारों यादों को संजोए,
मैं अपने घर से चली
पराए घर में अपना बसेरा बसाने
अपने ही रिश्तों को छोड़,
दूसरों को अपना बनाने
बनते रिश्तों में पुराने कहीं खो गए
न भूल कर भी, मार-ए-वक्त सह गए
जब मायके से कोई खबर आई
बिसरी यादें उभर आईं
वो खेलना झगड़ना और फफक कर रोना
मनवा कर मन की ठहाके से हँसना
सलोनी हैं यादें, पर अब में कहाँ हूँ
गति है ये जीवन, पर में खुद नहीं हूँ
छलकते ही आँखें, आवाज़ आई
"देखो न माँ दी सुनती नहीं
भूखा हूँ खाना परसती नहीं"
न यादें रहीं, न आसुँ बचे
बच्चों को डाँटा और मुस्कुराई
सपनों को मेरे ये पूरा करेंगे
कर्मों का मेरे ये फल बनेगे ।
रुचि शुक्ला
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