हमवतन बनो
देश-धर्म के ठेकेदार, पल में बदलें अपनी चाल
तुम तो समझो, तुम तो सुधरो, तुम ही लो अपना प्रतिकार
इनने बाँटा देश-धर्म को, क्षेत्रवाद के रोपे बीज
हिस्सों को हिस्सों में बाँटा, हिस्सों की भी तोड़ी पीठ
पाँच मूल की एकाकर उसने जोड़ा था संसार
इनने तोड़ा लाखों में, सेंकी रोटी खाई खीर
तरसे तुम पानी को मन भर, रक्त बहा नदियों की धार
शब्दों के भी तीर चले, बिका साग मोटी के भाव
कुर्सी के लालच में लाखों, वादे झूठे करते ये
पाँच वर्ष में एक बरस ही, दर्शन अपने देते ये
जनता को ही लूट रहे हैं, जनमत का ये ले आभार
फुट डालते लोगों में, बने देश का हैं अभिमान
सच्चा इन्सा; झूठी कौम, कदम कदम से बढ़ते पाँव
हमवतन बनो; कुछ जतन करो, इनको दे दो पहेला दाँव ।
रुचि शुक्ला
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