परेशान चिड़िया
सुबह की पहली आभा निकली
मीठी सी दी ध्वनि सुनाई
चहचहाहट चिड़िया की थी
दाना चुगने जो थी आई,
एक-एक दाना चुनके चिड़िया
डाल स्वयं की जाती थी
पल में बारिश आने को थी
सोच के ये घबराई थी,
ओट में कुछ नन्हें मुन्ने थे
भण्डारे का रोड़ा था
तीन दिन मुश्किल से गुजरे
आज निकलना दूभर था,
अपनी फिर भी कट जाएगी
इनकी कैसे सोचूं में
शायद इस उलझन में थी
ये देख अल्प मैं विचलित थी,
'गाडी' 'साड़ी' 'बाड़ी' के
चक्कर में फसते लोगों से
हर मौके पर मिलती थी मैं
स्व भी जिसकी भागी थी,
चिड़िया जैसा रास रचा था
हर आँगन और द्वारे पर
आप जिया इस जीवन को
पर मन में मेरे इच्छा है,
कुछ इतना सा कर जाऊँ
जो स्वर्ण जड़ित सा कहलाए ।
रुचि शुक्ला
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