अन्तर्द्वन्द्व
अन्तर्द्वन्द्व निरंतर चलता
इच्छा और उसूलों का
मन तो चाहे जहाँ सजाऊँ
सपनों और अरमानों का
डोर प्यार की बंधी हुई है
संस्कार से सजी हुई है
आदर्शों का चोला पहने
पहरी मन पर डटी हुई है
नहीं किसी का ख़ौफ़ सताता
लेकिन खुद की नजरों से
कैसे मन ये बच पाता
आप ही थोड़ा ऊँचा उठके
थोड़ा सा है थम जाता
अरमानों ने हाथ है थामा
कैसे पग बढ़ा पाता
डाँट ये खुद की खुद खाता
क्षण भर को सहम जाता
आत्म नियंत्रित रहने की
ढ़ेरों ये कसमें खाता
मंशा फिर जब आड़े आती
ढुलमुल मन बहक जाता
अपना डण्डा देख कर लेकिन
पुनः राह पर आ जाता ।
रुचि शुक्ला
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