आखिर क्या चाहता है, इन्सान?
समय का मूल्य चुकाता
यंत्रवत भिड़ा हुआ
रफ़्तार देता जिंदगी को
कहाँ जा रहा इन्सान?
असंतुष्ट
मूड़ में शिकायतें भरे
मर्ग-कस्तूरी मोह में
लक्ष्य खोजता इन्सान
अनुसंधानरत
क्रांतियों के दौर चलाता
गलाकाट होड़ में
कहाँ आ गया इन्सान?
गिला नहीं
आत्मकेन्द्रित प्रश्न है
आखिर क्या चाहता है
पुनः आदम बनता इन्सान?
रुचि शुक्ला
No comments:
Post a Comment