Friday, 23 September 2016

प्रश्न और उत्तर


          प्रश्न और उत्तर
 
     शुरुआत हुई थी प्रश्नों से ,
     आज अंत हुआ है प्रश्नों पर
     जन्मी थी तब प्रश्न उठा था
     क्यों आई हूँ पृथ्वी पर
     जिज्ञासा से भरी रही ,
     हर पल, हर क्षण मैं जीवन भर
     सच्चाई को  खोज रही हूँ ,
     अब तक मै इस पृथ्वी पर
     प्रश्नों का अंबार लगा है ,
     मेरे मन के आंगन पर
     एक का उत्तर जाना तो ,
     सौ प्रश्न बने उस उत्तर पर
     जितना अंदर उतर चुकी हूँ ,
     उतनी अथाह गहराई है
     ज्ञान के इस उजियारे में ,
     बस संग मेरे तन्हाई है
     ज्ञान का पूरा सागर है और
     बच्चों सा मेरा मन है
     जब थोड़े मोती पाती हूँ
     तब मन करता है और मिले
     अज्ञानी हूँ पर फिर भी मैं
     इससे तो अनभिज्ञ नहीं
     अनन्त ज्ञान का सागर है
     पर प्रश्नों का भी अंत नहीं
     जन्मी थी तब प्रश्न उठा था
     अब प्रश्न उठेगा मरने पर
     जाना है मुझको आज कहाँ,
     अब भवचक्र के घेरे में ?

                        रुचि शुक्ला
            

Tuesday, 20 September 2016

जीवन चक्र


                जीवन चक्र

  जीवन के सफर में, मंज़िलों की तलाश में
  अपने ही असूलों को लेकर अपने साथ में
  उड़ी थी गगन में स्वच्छन्दता की आस में
  रिस्ते मेरे साथ थे, परिवार का भरोसा था
  अकेले ही उड़ने का जब सपना मैने देखा था
  स्वार्थ में फँसी मैं, सबसे अनभिज्ञ थी
  जड़ विहीन तने की कल्पना से भी दूर थी
  कोपलों के आने का उस पल जो सपना देखा था
  आज जाना है मैंन, वो भी कितना झूठा था
  समाज का ही अंग हूँ , समाज का ही अंग थी
  इससे ही बनी हूँ मैं , फिर भी इससे दूर थी
  इतिहास का दौहराव आज मेरे साथ है
  जड़-तना-कोपल, तीनों मेरे पास हैं
  कोपलों के मन में , वही पुरानी आस है
  हँसती हूँ अब मैं , अपने ही आप पर
  क्यों रोकती हूँ अब मैं , इनकी इस उड़ान को
  यही ज़िंदगी है , ऐसा ही होता आया है
  यही होगा फिर से , इसे कौन रोक पाया है ?

                                      रुचि शुक्ला

जहाँ सजा सौ रंगों से


   
   
             जहाँ सजा सौ रंगों से

           मेरी सोंच भिन्न है तुझसे
          इसको लेकर लड़ना क्या ?
            पहले मैं पहुँचूँगा तुमसे
            इसको लेकर चिंता क्या
            रक्त बहा कर अपनों का
          बेहतर खुद को कहना क्या
          ख़ौफ़ दिखा कर लोगों का
           हावी होना अच्छा क्या ?
          आप हितों को पूरा करना
           नाम धर्म का लेना क्या ?
          नफरत से नफरत में जीना
          प्यार नाम पर रोना क्या ?
          कुछ अलग कुछ ऐसा वैसा
             जहाँ सजा सौ रंगों से
           इससे ही सुंदरता इसकी
           उजड़ेपन से तुलना क्या ?

                            रुचि शुक्ला
       
         

Thursday, 15 September 2016

कितना सच्चा, कितना झूठा ?


           कितना सच्चा, कितना झूठा ?

 सच्चाई खुद की खुद जाने
 फिर भी खुद को सच्चा माने
 शिकवा रहे दूजों से हर पल
  पर्दा आप करनी पर डाले

               दोषों को औरों पर मढ़ना
            पाक साफ अपने को कहना
                 नर नारी दोनों ने सीखा
             केवल स्वहित आगे रखना
     
 कर्तव्यों को पीछे छोड़ा
 सुरसा मुख माँगों का खोला
 दाम तले है वचन दवाया
 धर्म को अपने मन पर छोड़ा

                    मानव का ईमान है बदला
                नीति पाठ रह गया है सपना
               प्रकोप है ये कलयुग का आज
                 सब को है सतयुग की आस ।

                                     रूचि शुक्ला
     

Wednesday, 14 September 2016

जीवन का श्रृंगार


                  जीवन का श्रृंगार

             हार न पहनो कभी गले में
             न करो तूम बनाव श्रृंगार
             तुम चाहो तो जान सकोगे
             कौन तुम्हारा सच्चा श्रृंगार
             प्रीत चाहते हो जो जग से
             बनो त्यागमय शीत व्यवहार
             जो चाहो अनुजों से आदर
             ज्येष्ठ आदर करो तुम हाल
             श्रेष्ठ बनना जो तुम चाहो
             जीवन में कभी पिछड़ना न चाहो
             तो तुम  करो आज से मेहनत
             कल पर कोई बात न टालो
             यही तो बातें हैं जीवन में
             लाती हैं जो सदा उजाला
             अँधेरे को दूर भगाती
             बनाती है इतिहास को प्यारा।

                                      रूचि शुक्ला
           

दूर का तारा


                  दूर का तारा

  कहीं दूर जब तारा टिमटिमाया होगा
  तुम्हारे मन में भी तब ख़याल आया होगा
  इतना सुन्दर इसे किसने बनाया होगा
  उस तारे को छूने को मन तो ललचाया होगा

  तब थाम लिये होंगे तुमने ये कदम जानके
 आसमाँ को छूना एक मुसीबत मानके
 आसाँ न समझा होगा तारों के पास जाना
  हाथों से छू के उस किरण को छुपाना

  एक पल को आँख मूँद कर ध्यान भी हटाया होगा
  पर अपने मन में फिर वही ख़याल  पाया होगा
  मगर ए इन्साँ, एक बार तो कदम बढ़ाया होता
  अपना ये हाथ छूने की चाह से बढ़ाया होता

  तारा खुद हाथों में आ जाता तब
  तुमने मन में एक प्रयास जगाया होता
  मंजिलें जिंदगी की तारा ही नजर आती हैं
  छूने के एक प्रयास से जो तुम्हारे पास नजर आती हैं।

                                                रूचि शुक्ला

Tuesday, 13 September 2016

आत्मज्ञान

                     
                       आत्मज्ञान
     
              जीत लिया है खुदको जबसे
              दिखती है सुंदरता तबसे
              किसने किस्से, क्या बोला
              किसने पाया, क्या खोया
              क्यों नहीं है, इसकी चिन्ता
              सोच रही हूँ इसको गहरा
              एक बात पर आँसू टपके
              दूजे पर फिर हँसी फुहारे
              आगे बढ़ती, फिर मैं गिरती
              एक नई पर कोशिश करती
              झंझट क्या है ? सोचा पलभर
              जादू पाया मैने खुद में
              खेल रहा है वो हम सब से
              ऐसा कैसे बचपन उसमें
              हँसती हूँ मैं, उस पर जितना
              हँसे देख, मुझ पर वो उतना ।

                                          रूचि शुक्ला