पंक और प्यार
आज भौर बरसा था पानी
देख पंक धरा मैं जानी
मुश्किल थी गुइयाँ अब आनी
नहीं रही अब राह सुहानी,
बना पंक दलदल का कारण
धरा में हो या मूड में धारण
जहाँ में छाया पंक है इतना
मुश्किल है अब जीना सबका,
पंक रहित न कोई करम
नहीं रहा है कहीं धरम
हित को अपने जिसमें पाया
पैर छुए और काम बनाया,
झटका हाथ कदम बढ़ाया
उसपर ही इल्ज़ाम लगाया
पंक में ही है पंकज खिलता
आशा का है कारण इतना,
हम-राशी हैं राम और रावण
मन ही पंक मन ही पावन
हाथ बढ़ा कर वही उठाते
जिनसे हम हैं ठोकर खाते
जहाँ के हैं ये रंग हज़ार
कहीं है पंक तो कहीं है प्यार ।
रुचि शुक्ला
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