सफर का सच
अपनी जड़ों को देखना चाहता था
पर उसकी गहराई बहुत हो चुकी थी
पत्तों को अपने छूना चाहता था
पर उनकी दूरी बहुत हो चुकी थी
किस नर्सरी में मैं बोया गया था
जंगल में लाकर कब रोपा गया था
कितनी शाखाएँ मुझसे बन गईं थी
कितने नए पौधे उग गए थे
ये उलझी हुई थी इक कहानी
कि एक नया फूल फिर खिल गया है
इक नया बीज फल में बन गया है
न जाने वह फल कहाँ जाएगा
कहाँ बीज का फिर अंकुर बनेगा
ज़िंदगी का मेरी ये लंबा सफर है
न इस कल का पता है
न उस कल का पता है
'आज' की छोटी सी दुनिया है मेरी
हाँ ! सच भी यही, ख़ुशी भी यही है ।
रुचि शुक्ला
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