धारा का सफर
एक धारा बही थी साहिल की और,
बहुत ही निर्बल लगाती थी,
छोटे से रोढ़े में राह बदलती थी,
अकेली सुनसान राह पर चली जा रही थी
लगता था क्या मंजिल मिलेगी,
साथ सपनों के उमंगें लिये,
राह खोजती बढ़ रही थी,
पहाड़ों से गिरी और झरना बनी,
उछल कर फ़ौरन फिर बढ़ चली,
अब पर्वत भी कमज़ोर लगते थे,
किनारों पर उसके फूल खिलते थे,
लगता था विश्वाश रंग लाएगा,
प्रवाह उसका न थम पाएगा,
देखते ही देखते नदी बन गई,
बहुत दूर तक वह बहती रही,
आख़िर वो थोड़ा सा थक भी गई,
बाहें पसारे फिर बढ़ चली,
साहिल किनारे वो आ कर गिरी,
सागर की लहरों में अब खो गई,
विश्वास उसका न खोया कभी,
आखिर में साहिल को पाया तभी,
लेकिन, ये कोई अंत नहीं था,
आगे बढ़ना और कठिन था,
ठहरे सागर की हलचल को,
देख रही, नजदीकी से थी,
किंचित मन चिंतन में था,
कुछ सोच पग पीछे मोड़े,
फिर सागर की ओर बही वो,
पर अब भी संकोच वहिं था,
नेत्र भ्रम था इसमें थोड़ा,
सच जिसमें कुछ और छुपा था,
थकती गिरती उस धारा को,
थाम रहा था सागर बढ़ थोड़ा ।
रुचि शुक्ला