आत्मज्ञान
जीत लिया है खुदको जबसे
दिखती है सुंदरता तबसे
किसने किस्से, क्या बोला
किसने पाया, क्या खोया
क्यों नहीं है, इसकी चिन्ता
सोच रही हूँ इसको गहरा
एक बात पर आँसू टपके
दूजे पर फिर हँसी फुहारे
आगे बढ़ती, फिर मैं गिरती
एक नई पर कोशिश करती
झंझट क्या है ? सोचा पलभर
जादू पाया मैने खुद में
खेल रहा है वो हम सब से
ऐसा कैसे बचपन उसमें
हँसती हूँ मैं, उस पर जितना
हँसे देख, मुझ पर वो उतना ।
रूचि शुक्ला
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