कितना सच्चा, कितना झूठा ?
सच्चाई खुद की खुद जाने
फिर भी खुद को सच्चा माने
शिकवा रहे दूजों से हर पल
पर्दा आप करनी पर डाले
दोषों को औरों पर मढ़ना
पाक साफ अपने को कहना
नर नारी दोनों ने सीखा
केवल स्वहित आगे रखना
कर्तव्यों को पीछे छोड़ा
सुरसा मुख माँगों का खोला
दाम तले है वचन दवाया
धर्म को अपने मन पर छोड़ा
मानव का ईमान है बदला
नीति पाठ रह गया है सपना
प्रकोप है ये कलयुग का आज
सब को है सतयुग की आस ।
रूचि शुक्ला
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