दूर का तारा
कहीं दूर जब तारा टिमटिमाया होगा
तुम्हारे मन में भी तब ख़याल आया होगा
इतना सुन्दर इसे किसने बनाया होगा
उस तारे को छूने को मन तो ललचाया होगा
तब थाम लिये होंगे तुमने ये कदम जानके
आसमाँ को छूना एक मुसीबत मानके
आसाँ न समझा होगा तारों के पास जाना
हाथों से छू के उस किरण को छुपाना
एक पल को आँख मूँद कर ध्यान भी हटाया होगा
पर अपने मन में फिर वही ख़याल पाया होगा
मगर ए इन्साँ, एक बार तो कदम बढ़ाया होता
अपना ये हाथ छूने की चाह से बढ़ाया होता
तारा खुद हाथों में आ जाता तब
तुमने मन में एक प्रयास जगाया होता
मंजिलें जिंदगी की तारा ही नजर आती हैं
छूने के एक प्रयास से जो तुम्हारे पास नजर आती हैं।
रूचि शुक्ला
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