Wednesday, 14 September 2016

दूर का तारा


                  दूर का तारा

  कहीं दूर जब तारा टिमटिमाया होगा
  तुम्हारे मन में भी तब ख़याल आया होगा
  इतना सुन्दर इसे किसने बनाया होगा
  उस तारे को छूने को मन तो ललचाया होगा

  तब थाम लिये होंगे तुमने ये कदम जानके
 आसमाँ को छूना एक मुसीबत मानके
 आसाँ न समझा होगा तारों के पास जाना
  हाथों से छू के उस किरण को छुपाना

  एक पल को आँख मूँद कर ध्यान भी हटाया होगा
  पर अपने मन में फिर वही ख़याल  पाया होगा
  मगर ए इन्साँ, एक बार तो कदम बढ़ाया होता
  अपना ये हाथ छूने की चाह से बढ़ाया होता

  तारा खुद हाथों में आ जाता तब
  तुमने मन में एक प्रयास जगाया होता
  मंजिलें जिंदगी की तारा ही नजर आती हैं
  छूने के एक प्रयास से जो तुम्हारे पास नजर आती हैं।

                                                रूचि शुक्ला

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