जीवन चक्र
जीवन के सफर में, मंज़िलों की तलाश में
अपने ही असूलों को लेकर अपने साथ में
उड़ी थी गगन में स्वच्छन्दता की आस में
रिस्ते मेरे साथ थे, परिवार का भरोसा था
अकेले ही उड़ने का जब सपना मैने देखा था
स्वार्थ में फँसी मैं, सबसे अनभिज्ञ थी
जड़ विहीन तने की कल्पना से भी दूर थी
कोपलों के आने का उस पल जो सपना देखा था
आज जाना है मैंन, वो भी कितना झूठा था
समाज का ही अंग हूँ , समाज का ही अंग थी
इससे ही बनी हूँ मैं , फिर भी इससे दूर थी
इतिहास का दौहराव आज मेरे साथ है
जड़-तना-कोपल, तीनों मेरे पास हैं
कोपलों के मन में , वही पुरानी आस है
हँसती हूँ अब मैं , अपने ही आप पर
क्यों रोकती हूँ अब मैं , इनकी इस उड़ान को
यही ज़िंदगी है , ऐसा ही होता आया है
यही होगा फिर से , इसे कौन रोक पाया है ?
रुचि शुक्ला
जीवन के सफर में, मंज़िलों की तलाश में
अपने ही असूलों को लेकर अपने साथ में
उड़ी थी गगन में स्वच्छन्दता की आस में
रिस्ते मेरे साथ थे, परिवार का भरोसा था
अकेले ही उड़ने का जब सपना मैने देखा था
स्वार्थ में फँसी मैं, सबसे अनभिज्ञ थी
जड़ विहीन तने की कल्पना से भी दूर थी
कोपलों के आने का उस पल जो सपना देखा था
आज जाना है मैंन, वो भी कितना झूठा था
समाज का ही अंग हूँ , समाज का ही अंग थी
इससे ही बनी हूँ मैं , फिर भी इससे दूर थी
इतिहास का दौहराव आज मेरे साथ है
जड़-तना-कोपल, तीनों मेरे पास हैं
कोपलों के मन में , वही पुरानी आस है
हँसती हूँ अब मैं , अपने ही आप पर
क्यों रोकती हूँ अब मैं , इनकी इस उड़ान को
यही ज़िंदगी है , ऐसा ही होता आया है
यही होगा फिर से , इसे कौन रोक पाया है ?
रुचि शुक्ला
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