जीवन का श्रृंगार
हार न पहनो कभी गले में
न करो तूम बनाव श्रृंगार
तुम चाहो तो जान सकोगे
कौन तुम्हारा सच्चा श्रृंगार
प्रीत चाहते हो जो जग से
बनो त्यागमय शीत व्यवहार
जो चाहो अनुजों से आदर
ज्येष्ठ आदर करो तुम हाल
श्रेष्ठ बनना जो तुम चाहो
जीवन में कभी पिछड़ना न चाहो
तो तुम करो आज से मेहनत
कल पर कोई बात न टालो
यही तो बातें हैं जीवन में
लाती हैं जो सदा उजाला
अँधेरे को दूर भगाती
बनाती है इतिहास को प्यारा।
रूचि शुक्ला
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