एक प्रयास
आप ही निर्मित, चक्रव्यूह में फंसी हुई
मन को असूलों की, चादर से ढँकी हुई
डगमगाते क़दमों से, दिशा-ए-मंज़िल बढ़ रही
बहुत हैं गुन्जाइशें, आज भी सुधार की
जारी हैं कोशिशें आज उसी उत्साह से
गिरती हूँ, थमती हूँ, फिर से सम्भलती हूँ
एक नया प्रयास, चाह-ए-बुलंदी करती हूँ
बदली है जिंदगी और मुझमें भी बदलाव है
विश्वास है, लगन है, फिर धूप का भी संग है।
रूचि शुक्ला
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